Congress' Midsummer Folly: Rajat Sharma
5 जून को स्वामी रामदेव ने मुझसे पूछा था कि क्या ऐसा हो सकता है कि पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने की कोशिश करे ? मैंने उनसे कहा कि कोई भी सरकार इतनी ब़ड़ी गलती नही करेगी “ आप शांति से अनशन कर रहे हैं ,आपके हज़ारो समर्थक मौजूद हैं, चालीस TV Channels की OB Vans वहां खड़ी हैं.” .. मैंने उनसे कहा था 'सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह ऐसा कभी नहीं होने देंगे'...मेरा विश्वास था कि कांग्रेस ने Emergency के अनुभव से सबक सीखा है...पिछले 7 साल के शासन में सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह ने ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे ये लगा हो कि वो पुलिस और लाठी के बल पर अपनी सत्ता की ताकत दिखाने का कोशिश करेंगे
लेकिन कुछ ही घंटे बाद सरकार ने मुझे गलत साबित कर दिया..मैंने स्वामी रामदेव से कहा था कि आप निश्चिंत होकर सोइये... देर रात मुझे इंडिया टीवी के Newsroom से फोन आया : "सर, रामलीला मैदान में पुलिस ने धावा बोल दिया है"...फिर उस रात टी वी पर जो कुछ देखा ,आंखों पर विश्वास नहीं हुआ कोई ऐसा कैसे कर सकता है ...कैमरों और रिपोर्ट्स की आंखों के सामने पुलिस ने लाठियां चलाईं, आंसू गैस के गोले छोड़े, बूढ़े और बच्चों को पीटा, महिलाओं के कपड़े फाड़ दिए...मैंने स्वामी रामदेव को अपने सहयोगी के कंधे पर बैठकर बार-बार पुलिस से ये कहते सुना- "यहां लोगों को मत मारो, मैं गिरफ्तारी देने को तैयार हूं"...लेकिन जब सरकार पांच हजा़र की पुलिस फोर्स को कहीं भेजती है तो वो फोर्स ऐसी बातें सुनने के लिए तैयार नहीं होती...पुलिस वालों की Training डंडा चलाने के लिए होती है, आंसू गैस छोड़ने और गोली चलाने के लिए होती है पुलिस ये नही समझती कि जो लोग वहां सो रहे हैं वो दिनभर के भूखे हैं , अगर वहां मौजूद भीड़ उग्र हो जाती है तो पुलिस गोली भी चला देती...वो भगवान का शुक्र है कि स्वामी रामदेव के Followers में ज्यादातर बूढ़े, महिलाएं और बच्चे थे या फिर उनके चुने साधक थे जिनकी Training उग्र होने की नहीं है
जब दिन में स्वामी रामदेव ने मुझे फोन किया था तो उन्होंने कहा था - कि किसी ने उन्हें पक्की खबर दी है कि ''आधी रात को हजारों पुलिसवाले शिविर को खाली कराने की कोशिश करेंगे'' और ये भी कहा कि ''पुलिस गोली चलाकर या आग लगाकर उन्हें मार भी सकती है''...मैंने स्वामी रामदेव से कहा था कि ''ऐसा नहीं हो सकता-हजारों पुलिस शिविर में घुसे ये कभी नहीं होगा और आप को मारने की तो बात कोई सपने में सोच भी नहीं सकता''...रात एक बजे से सुबह पांच बजे तक टी वी पर पुलिस का तांडव देखते हुए मैं यही सोचता रहा कि रामदेव कितने सही थे और मैं कितना गलत...ये मुझे बाद में समझ आया कि स्वामी रामदेव ने महिला के कपड़े पहनकर भागने की कोशिश क्यों की...उन्होंने सोचा जब पुलिस घुसने की बात सही है
लाठियां चलाने की बात सही है तो Encounter की बात भी सही होगी ...मैं कांग्रेस को अनुभवी नेताओं की पार्टी मानता हूं...मेरी हमेशा मान्यता रही है कि कांग्रेस को शासन करना आता है...लेकिन 5 जून की रात की बर्बरता ने मुझे हैरान कर दिया...समझ में नहीं आ रहा कि आखिर सरकार ने ये किया क्यों ?...उससे भी बड़ा सवाल ये उठा कि कांग्रेस को या सरकार को इससे मिला क्या?
सरकार को मिला सुप्रीम कोर्ट का नोटिस जिसमें ये बताना पड़ेगा कि रात के अंधेरे में पुलिस की बर्बरता का औचित्य (justification) क्या था...सरकार ये कैसे कहेगी कि हमने ये इसलिए किया कि ये बताना था कि सरकार की ताकत क्या होती है...हम जब चाहें किसी की भी जुबान पर लगाम लगा सकते हैं...कपिल सिब्बल ने उस दिन शाम को कहा था ( if we know to accommodate, we also know how to rein in)''हम अगर किसी के लिए रास्ता बनाना जानते है तो लगाम लगाना भी जानते है”
कांग्रेस को क्या मिला..जो स्वामी रामदेव बीजेपी से नाता तोड़कर कांग्रेस की तरफ दोस्ती का हाथ बड़ा रहे थे, उन्हें अपना दुश्मन बना लिया...जो स्वामी रामदेव RSS के लोगों से दूरी बना रहे थे, अपने साथ मुस्लिम नेताओं को खड़ा कर रहे थे ताकि उनकी ऐसी छवि बने जो सबको स्वीकार्य हो - उन्हें कांग्रेस ने धक्का देकर RSS के पाले में फेंक दिया...कांग्रेस ने रात को पुलिस से स्वामी रामदेव के समर्थकों की पिटाई करवा कर, मायावती और मुलायम सिंह दोनों को रामदेव के साथ खड़ा कर दिया...जो वृंदा करात स्वामी रामदेव की खुलेआम आलोचना करती थीं, वो रात को TV Channels पर रामदेव के समर्थन में पुलिस के अत्याचार को सबसे सख्त शब्दों में निंदा करती नज़र आईं
कांग्रेस और सरकार दोनों अन्ना हजारे से परेशान थी...वो रामदेव को अन्ना हजारे के जवाब के रूप में देख रही थी ...लेकिन रात को पुलिस की लाठियों और आंसूगैस ने इसे उल्टा कर दिया...जो अन्ना और रामदेव एक दूसरे से उखड़े हुए थे अब साथ-साथ हैं...अन्ना हजारे रामलीला मैदान की पुलिस बर्बरता के खिलाफ अनशन करेंगे...अब सरकार इन दोनों से एक साथ निबटना होगा
कांग्रेस को क्या मिला? मिला तो बीजेपी को...जो पार्टी बार-बार उठने की कोशिश कर रही थी लेकिन उसके पास सरकार के खिलाफ कोई बड़ा मुद्दा नही था...अब पूरी ताकत के साथ मैदान में है .कांग्रेस ने उसके हाथ में एक मुद्दा दे दिया, रामदेव जैसा लीडर दे दिया और करोड़ों लोगों का जनाधार ,लोगों को लाठियां मार-मारकर बीजेपी को उपहार में दे दिया...अब कांग्रेस को बीजेपी से, रामदेव से, अन्ना हजारे की Civil Society से, मायावती से, मुलायम सिंह से, एक साथ लड़ना है...इसके बदले मिला क्या- लालू यादव का समर्थन जिनके लोकसभा में सिर्फ चार MP हैं और बिहार में सिर्फ बाईस MLA हैं
पुलिस की लाठियां चलाने और लोगों का खून बहाने की टाइमिंग भी कमाल की थी कपिल सिब्बल ने रामदेव से हुई डील की चिट्ठी दिखाकर भ्रम पैदा कर दिया था..रामदेव defensive पर थे...वो बार-बार सफाई दे रहे थे कि चिट्ठी में सिर्फ इतना लिखा है कि हमारी सारी मांगें पूरी हो जाएंगी तो दो दिन के बाद अनशन खत्म हो जाएगा...लेकिन रात में 5000 की पुलिस फोर्स भेजकर सरकार ने रामदेव को Offensive कर दिया...अब वो लगाताक उन सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह पर हमला कर रहे हैं जिनका नाम लेकर उन्होंन पिछले पांच साल में एक शब्द नहीं कहा था.
दिग्विजय सिंह ने स्वामी रामदेव को ठग कहा, उनके सहयोगी आचार्य बालकृष्ण को चोर कहा...सरकार से उनकी जांच कराने की मांग की...फिर हिंदुस्तान टाइम्स में खबर छपी कि CBI और ED स्वामी रामदेव के ट्रस्ट और कंपनियों की जांच करेगी...अगर स्वामी रामदेव ठग हैं तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उनसे अनशन वापस लेने की अपील क्यों की ?...प्रधानमंत्री ने एक ठग को चिट्ठी लिखकर ये क्यों कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आपकी मुहिम सही है...अगर स्वामी रामदेव के ट्रस्ट और कंपनियों की जांच होनी है तो देश के Finance Minister प्रणब मुखर्जी तीन और मंत्रियों के साथ उन्हें एयरपोर्ट पर लेने क्यों गए?...अगर कपिल सिब्बल ये जानते थे कि स्वामी रामदेव भरोसे के आदमी नहीं हैं तो फिर सरकार ने भ्रष्टाचार और कालेधन के सवाल पर उनकी ज्यादातर मांगें क्यों मान ली हैं कपिल सिब्बल ने प्रेस कांफ्रेस बुलाकर ये क्यों कहा कि हमने स्वामी रामदेव की सभी मांगे मान ली हैं ?...क्या ये सरकार ऐसे व्यक्ति के साथ डील कर रही थी जिसकी जांच CBI और ED को करनी है
कौन विश्वास करेगा स्वामी रामदेव पर ठगी और बेईमानी जैसे आरोपों का ? दिग्विजय सिंह की बात समझ में आती है, उनका अपना एजेंडा है...लेकिन सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह ने तो कभी ऐसे एजेंडे को नहीं अपनाया...क्या अब CBI और ED के दम पर फिर से साबित किया जाना है कि सरकार की ताकत क्या होती है?...स्वामी रामदेव को ये बताना है कि हमसे लड़ोगे तो तुम्हारा दिमाग ठिकाने लगा देंगे
अगर सरकार ने ये करके अपना इकबाल जतला भी दिया तो क्या मिलेगा ? ...लोकतंत्र में कोई भी जनता का विश्वास राजनैतिक दलों के लिए ऑक्सीजन का काम करता है...सत्ता का अहंकार- किसी भी पार्टी के लिए तेजाब का काम करता है...इतिहास गवाह है कि लोकतंत्र में डंडे के बल पर शासन नहीं चलता...जो सरकारें विरोध के स्वर का सम्मान करती हैं, शांतिपूर्ण ढंग से आलोचना करने वालों की बात सुनती हैं, वही सरकारें ज्यादा दिन चलती हैं...ये फैसला कांग्रेस को करना है कि उसे आक्सीज़न चाहिए या तेज़ाब
6417mera%20desh%20mera%20jeevan%20m
बुधवार, 8 जून 2011
गुरुवार, 2 जून 2011
भ्रष्टाचार मिटाओ सत्याग्रह -4 जून 2011
४ जून से रामलीला मैदान पर
परम पूज्य स्वामी रामदेवजी अनिश्चित कालीन उपवास पर बैठेंगे
भ्रष्टाचार मिटाओ सत्याग्रह -4 जून 2011 को दिल्ली के रामलीला मैदान में स्वामीजी स्वयं अनिश्चित कालीन उपवास पर बैठेंगे । परम पूजनीय स्वामी रामदेव जी के साथ इस सत्याग्रह में भाग लेने व अन्य प्रकार के सहयोग हेतु पंजीकरण करने कृपया दिये गए फार्म मे अपनी जानकारी व आपके द्वारा दिये जाने वाले सहयोग / का विवरण आज ही दर्ज करे जिससे समय आने पर आपको आवश्यकतानुसार कार्य सौपा जा सके ।
Share
आज ही पंजीयन कराये
Name:
E-Mail Id:
Mobile No: * *
Type of action:
Select Campaign Email Campaigning Anshan in Delhi Amaran Anshan in Delhi SMS Campaign Other Campaign Internet Campaign FaceBook/Orkut/Tutur
Address:
परम पूज्य स्वामीजी के साथ आमरण अनशन पर बैठने के लिए अपना नाम फोन नं 01334-240008 या divyayoga@rediffmail.com पर रजिस्टर कराकर इस राष्ट्रीय आंदोलन को समर्थन करे ।
परम पूज्य स्वामी रामदेवजी अनिश्चित कालीन उपवास पर बैठेंगे
भ्रष्टाचार मिटाओ सत्याग्रह -4 जून 2011 को दिल्ली के रामलीला मैदान में स्वामीजी स्वयं अनिश्चित कालीन उपवास पर बैठेंगे । परम पूजनीय स्वामी रामदेव जी के साथ इस सत्याग्रह में भाग लेने व अन्य प्रकार के सहयोग हेतु पंजीकरण करने कृपया दिये गए फार्म मे अपनी जानकारी व आपके द्वारा दिये जाने वाले सहयोग / का विवरण आज ही दर्ज करे जिससे समय आने पर आपको आवश्यकतानुसार कार्य सौपा जा सके ।
Share
आज ही पंजीयन कराये
Name:
E-Mail Id:
Mobile No: * *
Type of action:
Select Campaign Email Campaigning Anshan in Delhi Amaran Anshan in Delhi SMS Campaign Other Campaign Internet Campaign FaceBook/Orkut/Tutur
Address:
परम पूज्य स्वामीजी के साथ आमरण अनशन पर बैठने के लिए अपना नाम फोन नं 01334-240008 या divyayoga@rediffmail.com पर रजिस्टर कराकर इस राष्ट्रीय आंदोलन को समर्थन करे ।
मंगलवार, 19 अक्टूबर 2010
शुक्रवार, 24 सितंबर 2010
गुरुवार, 5 अगस्त 2010
Do You Know Your Sonia? - by Dr. Subramanian Swamy
We have to ensure that the Maino clan does not stay in power. Dr. Manmohan Singh may be PM, which is a small relief, but he is not a fighter. The real power in government today is wielded by the Maino mafia gang. Can they be dethroned? I argue that they must be, for India’s integrity and democracy.
In Indian democracy, other than by losing majority, only a shocking scandal can unseat a government. Today’s priority is however not for toppling the Congress government as such, since Manmohan Singh is a decent and scholarly person, but in driving the Maino clan out of India. If the only way that can be done is by toppling the Singh government, then so be it. But the successor government should be such that it will not protect Sonia and her clan as Vajpayee’s did.
It will although not be long before Sonia will give Manmohan Singh marching orders, and he will march out meekly. We should not expect him to resist. Thus time with patriotic Indians is limited.
With Sonia’s defacto government in place, it is also unrealistic to expect that I can get an early victory in the courts on the KGB and antique smuggling cases. The most potent scandal at hand, therefore, that can dislodge the Maino clan[including Rahul and Priyanka] lies in exposing their existing Italian citizenship. That will galvanise the people.
In 1992, Sonia had revived her citizenship of Italy under Article 17 of the Italian Citizenship Law [Act 91 of 1992]. Rahul and Priyanka were born Italian citizens because Sonia was Italian when she gave birth to them[Italian law based on jure sanguinis]. (see Annexure-19) Hence, they continue be Italians since they have never renounced their citizenship upon becoming 21 years old. Both, Rahul and Priyanaka have been traveling abroad on Italian passports. They may now acquire Venezuela passports too, since Rahul Gandhi’s wife, Veronica, is a Venezuelan. (See annexure- 20) That means one more foreign bahu for us tolerant Indians. The Maino-Gandhis are certainly getting Indian society globalised in their own selfish way.
To end Bharat Mata’s shame and pain, what can patriotic Indians do in a democracy?
As a first step there is an urgent need to document the facts about their citizenship on notarized paper, for which we need to set up a network in London, Milan, Hongkong, and in Venezuela. Those persuaded by my above stated facts and arguments may join in and help set up this network. Other steps can come later once this is accomplished.
Sorce:http://www.janataparty.org/soniaintro.html
In Indian democracy, other than by losing majority, only a shocking scandal can unseat a government. Today’s priority is however not for toppling the Congress government as such, since Manmohan Singh is a decent and scholarly person, but in driving the Maino clan out of India. If the only way that can be done is by toppling the Singh government, then so be it. But the successor government should be such that it will not protect Sonia and her clan as Vajpayee’s did.
It will although not be long before Sonia will give Manmohan Singh marching orders, and he will march out meekly. We should not expect him to resist. Thus time with patriotic Indians is limited.
With Sonia’s defacto government in place, it is also unrealistic to expect that I can get an early victory in the courts on the KGB and antique smuggling cases. The most potent scandal at hand, therefore, that can dislodge the Maino clan[including Rahul and Priyanka] lies in exposing their existing Italian citizenship. That will galvanise the people.
In 1992, Sonia had revived her citizenship of Italy under Article 17 of the Italian Citizenship Law [Act 91 of 1992]. Rahul and Priyanka were born Italian citizens because Sonia was Italian when she gave birth to them[Italian law based on jure sanguinis]. (see Annexure-19) Hence, they continue be Italians since they have never renounced their citizenship upon becoming 21 years old. Both, Rahul and Priyanaka have been traveling abroad on Italian passports. They may now acquire Venezuela passports too, since Rahul Gandhi’s wife, Veronica, is a Venezuelan. (See annexure- 20) That means one more foreign bahu for us tolerant Indians. The Maino-Gandhis are certainly getting Indian society globalised in their own selfish way.
To end Bharat Mata’s shame and pain, what can patriotic Indians do in a democracy?
As a first step there is an urgent need to document the facts about their citizenship on notarized paper, for which we need to set up a network in London, Milan, Hongkong, and in Venezuela. Those persuaded by my above stated facts and arguments may join in and help set up this network. Other steps can come later once this is accomplished.
Sorce:http://www.janataparty.org/soniaintro.html
लेबल:
janataparty,
Rahul and Priyanaka,
Sonia
गुरुवार, 24 जून 2010
आपातकाल वह काली रात, जब लोकतंत्र हुआ था नजरबंद :आईएएनएस
वह काली रात, जब लोकतंत्र हुआ था नजरबंद
(आपातकाल की 33 वीं सालगिरह पर विशेष)
नई दिल्ली, 24 जून(आईएएनएस)। इतिहास में प्रत्येक युग किसी बड़ी अवधारणा का द्योतक होता है, जिसे कई वैज्ञानिकों और राजनीतिक चिंतकों ने 'सामूहिक मन' कहा है। जब यह अवधारणा अधिकांश लोगों के दिलो-दिमाग पर छा जाती है, तब वह इतिहास की प्रेरक शक्ति बन जाती है। इस दृष्टि से देखने पर पता चलेगा कि बीसवीं शताब्दी के अधिकांश आंदोलन परस्पर संबंधित दो बड़ी अवधारणाओं से प्रेरित थे-स्वतंत्रता और लोकतंत्र।
स्वतंत्रता की तलाश में कई परतंत्र राष्ट्रों ने उपनिवेशवादी शासन के विरुध्द संघर्ष किया। हालाँकि राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए इनमें से अधिकांश संघर्षों की शुरुआत अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में हुई, लेकिन उनके परिणाम मुख्य रूप से बीसवीं शताब्दी में प्राप्त हुए। राष्ट्र की स्वतंत्रता के साथ अन्य सशक्त आकांक्षाएँ भी पनपीं-जैसे राजतंत्र, सैनिक तानाशाह, निरंकुश कम्युनिस्ट पार्टी अथवा अन्य प्रकार की दमनकारी व्यवस्था के विरुध्द जनता के शासन की आकांक्षा। राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए संघर्ष तो विदेशी शक्ति के विरुध्द करना पड़ा, किंतु लोकतंत्र के लिए संघर्ष आंतरिक शासन-व्यवस्था के विरुध्द करना पड़ा।
कई देशों में राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अभियान जितना कठिन था, लगभग उतना ही कठिन था लोकतंत्र के लिए संघर्ष-और इसे उतने ही हिंसात्मक रूप से कुचल दिया गया। भावी इतिहासकार यह दर्ज करेंगे कि दो विश्व युध्द यदि बीसवीं शताब्दी के फलक पर दाग हैं तो स्वतंत्रता और लोकतंत्र की विजय इस युग की गौरवशाली उपलब्धि हैं।
भारत में हम लोग सौभाग्यशाली रहे कि हमारे पड़ोसी देशों और विश्व के अन्य देशों की भाँति सन् 1947 में ब्रिटिश शासन से मुक्त होने के बाद हमें लोकतंत्र के लिए अलग से युध्द नहीं करना पड़ा। स्वतंत्र भारत में लोकतंत्र उतने ही सहज ढंग से आया जैसे कि यहाँ पर पंथनिरपेक्षता स्वाभाविक रूप से थी; जैसाकि मैं इस संबंध में आगे चर्चा करूँगा। इन दोनों अवधारणाओं की स्वाभाविक स्वीकृति मुख्य रूप से भारत की हिंदू प्रकृति के कारण हुई। मानव इतिहास में हमेशा ऐसे उदाहरण रहे हैं कि कोई अवधारणा कितनी भी उदार क्यों न हो और उसकी जड़ें देश की सांस्कृतिक-आध्यात्मिक भूमि में कितनी ही गहरी क्यों न हो, किंतु ऐसा नहीं हुआ है कि वह अहंकार-प्रेरित और सत्ता की लोलुपता में मदांध लोगों के प्रहार से सदैव बच गई हो। जब ऐसे प्रहार होते हैं तो जिस अवधारणा पर प्रहार होता है, कुछ देर के लिए उसपर ग्रहण लग जाता है। लेकिन ग्रहणकाल की इसकी वेदना ही छाए हुए अंधकार को दूर करने के लिए संघर्ष हेतु और अविनाशी अवधारणा के देदीप्यमान प्रकाश को बिखेरने के लिए विशाल जनसमूह को प्रेरित करती है।
ऐसा लगता है कि राष्ट्र को उचित सीख लेने और इसके माध्यम से उस अवधारणा हेतु अपनी प्रतिबध्दता बहाल करने के लिए इतिहास जान-बूझकर ऐसी अग्नि-परीक्षा की स्थिति पैदा करता है।
ऐसा ही कुछ जून 1975 में भारत में हुआ, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारत पर कू्रर आपातकालीन शासन लागू कर लोकतंत्र पर ग्रहण लगा दिया। उन्नीस माह के बाद कांग्रेस पार्टी की तानाशाही के विरुध्द भारत की जनता के गौरवशाली संघर्ष के परिणामस्वरूप यह ग्रहण छँटा। यदि आपातकाल स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक अंधकारमय अवधि थी तो लोकतंत्र की बहाली के लिए किया गया विजयी संघर्ष सबसे देदीप्यमान घटना। ऐसा हुआ कि मैं अपने हजारों देशवासियों की तरह आपातकाल की संपूर्ण उन्नीस माह की अवधि जेल में व्यतीत करने के कारण इसका भुक्तभोगी तथा आपातकाल के विरुध्द युध्द में विजय प्राप्त करनेवाली लोकतंत्र सेना का एक सेनानी-दोनों रूपों में था।
जून 1975 की दो दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ:
भारत की स्वतंत्रता के साठ वर्षों पर नजर डालने पर पता चलता है कि इन छह दशकों में दो तिथियाँ ऐसी हैं, जिन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता है और ये दोनों जून 1975 से जुड़ी हुई हैं।
इनमें से एक है-12 जून। सभी राजनीतिक विश्लेषकों को अचंभे में डालते हुए गुजरात विधानसभा चुनावों में इंदिरा कांग्रेस की भारी पराजय हुई। दूसरा, उसी दिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रायबरेली से इंदिरा गांधी के लोकसभा में चुने जाने को निरस्त कर दिया और इसके साथ ही चुनावों में भ्रष्टाचार फैलाने के आधार पर उन्हें छह वर्षों के लिए चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित कर दिया।
दूसरी तिथि है-25 जून। लोकतंत्र-प्रेमियों के लिए यह तिथि स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे काले दिवसों में से एक के रूप में याद रखी जाएगी। इस दुर्भाग्यपूर्ण तिथि से घटनाओं की ऐसी शृंखला चल पड़ी, जिसने विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को विश्व की दूसरी सबसे बड़ी तानाशाही में परिवर्तित कर दिया।
दिल्ली में जून के महीने में सबसे अधिक गरमी होती है। अतएव जब दल-बदल के विरुध्द प्रस्तावित कानून से संबंधित संयुक्त संसदीय समिति ने बगीचों के शहर बंगलौर, जो कि ग्रीष्मकाल में भी अपनी शीतल-सुखद जलवायु के लिए विख्यात है, में 26-27 जून को अपनी बैठक करने का निर्णय लिया तो मुझे काफी प्रसन्नता हुई। हम दोनों-अटलजी और मैं-इस समिति के सदस्य थे, जिसके कांग्रेस (ओ) के नेता श्याम नंदन मिश्र भी सदस्य थे।
हालाँकि, जब 25 जून की सुबह मैं दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पर बंगलौर जानेवाले विमान पर सवार हुआ तो मुझे इस बात का जरा भी खयाल नहीं था कि यह यात्रा दो वर्ष लंबी अवधि के लिए मेरे 'निर्वासन' की शुरुआत है, जिसके संबंध में माउंट आबू बैठक के दौरान पार्टी सांसद और प्रख्यात ज्योतिषी डॉ. वसंत कुमार पंडित ने भविष्यवाणी की थी।
लोकसभा के अधिकारियों ने बंगलौर हवाई अड्डे पर मेरे सहयात्री मिश्र और मेरी अगवानी की। राज्य विधानसभा के विशाल भवन के पास स्थित विधायक निवास पर हमें ले जाया गया। अटलजी एक दिन पहले ही वहाँ पहुँच चुके थे। इस संयुक्त संसदीय समिति के अध्यक्ष थे-कांग्रेस पार्टी के दरबारा सिंह, जो बाद में पंजाब के मुख्यमंत्री बने।
26 जून को सुबह 7.30 बजे मेरे पास जनसंघ के स्थानीय कार्यालय से एक फोन आया। दिल्ली से जनसंघ के सचिव रामभाऊ गोडबोले का एक अत्यावश्यक संदेश था। वे कह रहे थे कि मध्य रात्रि के तुरंत बाद जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई और अन्य महत्त्वपूर्ण नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया है। गिरफ्तारी जारी है। पुलिस शीघ्र ही अटलजी और आपको गिरफ्तार करने के लिए पहुँचने वाली होगी। मैंने यह सूचना श्याम बाबू को दी। इसके बाद हम लोग एक साथ अटलजी के कमरे में गए। इस संबंध में संक्षिप्त चर्चा के बाद हम इस निर्णय पर पहुँचे कि हम लोग गिरफ्तारी से बचने का प्रयास नहीं करेंगे।
8.00 बजे आकाशवाणी से समाचार सुनने के लिए मैंने रेडियो चलाया। मुझे आकाशवाणी समाचारवाचक की परिचित आवाज के स्थान पर इंदिरा गांधी की गमगीन आवाज सुनाई दी। यह उनका राष्ट्र के नाम किया जानेवाला अचानक प्रसारण था, इस सूचना के साथ कि राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत आपातकाल घोषित कर दिया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आंतरिक अशांति से निबटने के लिए आपातकाल लागू करना आवश्यक था।
मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ, जब मैंने उन्हें यह कहते हुए सुना कि विपक्ष के बहुत बड़े षडयंत्र से देश को बचाने की आवश्यकता है। इसके साथ ही उनका मनगढ़ंत आरोप यह था कि कुछ ऐसे तत्त्व हैं, जो लोकतंत्र के नाम पर भारत के लोकतंत्र को मिटाने के लिए तत्पर थे और इसे रोकने की आवश्यकता थी।
अटलजी और मैंने एक संयुक्त प्रेस वक्तव्य तैयार किया, जिसमें जयप्रकाशजी* और अन्य नेताओं की गिरफ्तारी की भर्त्सना की गई, आपातकाल की निंदा की गई और घोषणा की गई कि 26 जून, 1975 का वही ऐतिहासिक महत्त्व होगा, जो स्वतंत्रता पूर्व अवधि में 9 अगस्त, 1942 का है, जब महात्मा गांधी ने ब्रिटिश शासकों से कहा था-'भारत छोड़ो।'
हालाँकि यह वक्तव्य एक व्यर्थ प्रयास था। लोगों तक इस संदेश को पहुँचाने का कोई माध्यम ही नहीं था, क्योंकि आपातकाल की घोषणा के साथ ही सरकार ने तानाशाही की चिरपरिचित परंपरा के अनुकूल प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दी। स्वतंत्रता के बाद पहली बार प्रेस पर पूर्ण सेंसरशिप** लगाई गई थी।
पुलिस हम लोगों को गिरफ्तार करने के लिए सुबह 10.00 बजे आ पहुँची। प्रख्यात समाजवादी नेता मधु दंडवते भी एक अन्य संसदीय समिति की बैठक में भाग लेने के लिए बंगलौर में मौजूद थे, उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। हम चारों को बंगलौर सेंट्रल जेल ले जाया गया। उस दिन, मेरी डायरी*** में उल्लिखित है-''26 जून, 1975 का दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का अंतिम दिन हो सकता है। आशा करता हूँ कि मेरा यह भय गलत सिध्द हो।'
-लालकृष्ण आडवाणी
(यह लेख वरिष्ठ भाजपा नेता एवं पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की आत्मकथा 'मेरा देश मेरा जीवन' से लिया गया है। प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक का लोकार्पण 25 जून को भोपाल में श्रीश्री रविशंकर करेंगे )
(आपातकाल की 33 वीं सालगिरह पर विशेष)
नई दिल्ली, 24 जून(आईएएनएस)। इतिहास में प्रत्येक युग किसी बड़ी अवधारणा का द्योतक होता है, जिसे कई वैज्ञानिकों और राजनीतिक चिंतकों ने 'सामूहिक मन' कहा है। जब यह अवधारणा अधिकांश लोगों के दिलो-दिमाग पर छा जाती है, तब वह इतिहास की प्रेरक शक्ति बन जाती है। इस दृष्टि से देखने पर पता चलेगा कि बीसवीं शताब्दी के अधिकांश आंदोलन परस्पर संबंधित दो बड़ी अवधारणाओं से प्रेरित थे-स्वतंत्रता और लोकतंत्र।
स्वतंत्रता की तलाश में कई परतंत्र राष्ट्रों ने उपनिवेशवादी शासन के विरुध्द संघर्ष किया। हालाँकि राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए इनमें से अधिकांश संघर्षों की शुरुआत अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में हुई, लेकिन उनके परिणाम मुख्य रूप से बीसवीं शताब्दी में प्राप्त हुए। राष्ट्र की स्वतंत्रता के साथ अन्य सशक्त आकांक्षाएँ भी पनपीं-जैसे राजतंत्र, सैनिक तानाशाह, निरंकुश कम्युनिस्ट पार्टी अथवा अन्य प्रकार की दमनकारी व्यवस्था के विरुध्द जनता के शासन की आकांक्षा। राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए संघर्ष तो विदेशी शक्ति के विरुध्द करना पड़ा, किंतु लोकतंत्र के लिए संघर्ष आंतरिक शासन-व्यवस्था के विरुध्द करना पड़ा।
कई देशों में राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अभियान जितना कठिन था, लगभग उतना ही कठिन था लोकतंत्र के लिए संघर्ष-और इसे उतने ही हिंसात्मक रूप से कुचल दिया गया। भावी इतिहासकार यह दर्ज करेंगे कि दो विश्व युध्द यदि बीसवीं शताब्दी के फलक पर दाग हैं तो स्वतंत्रता और लोकतंत्र की विजय इस युग की गौरवशाली उपलब्धि हैं।
भारत में हम लोग सौभाग्यशाली रहे कि हमारे पड़ोसी देशों और विश्व के अन्य देशों की भाँति सन् 1947 में ब्रिटिश शासन से मुक्त होने के बाद हमें लोकतंत्र के लिए अलग से युध्द नहीं करना पड़ा। स्वतंत्र भारत में लोकतंत्र उतने ही सहज ढंग से आया जैसे कि यहाँ पर पंथनिरपेक्षता स्वाभाविक रूप से थी; जैसाकि मैं इस संबंध में आगे चर्चा करूँगा। इन दोनों अवधारणाओं की स्वाभाविक स्वीकृति मुख्य रूप से भारत की हिंदू प्रकृति के कारण हुई। मानव इतिहास में हमेशा ऐसे उदाहरण रहे हैं कि कोई अवधारणा कितनी भी उदार क्यों न हो और उसकी जड़ें देश की सांस्कृतिक-आध्यात्मिक भूमि में कितनी ही गहरी क्यों न हो, किंतु ऐसा नहीं हुआ है कि वह अहंकार-प्रेरित और सत्ता की लोलुपता में मदांध लोगों के प्रहार से सदैव बच गई हो। जब ऐसे प्रहार होते हैं तो जिस अवधारणा पर प्रहार होता है, कुछ देर के लिए उसपर ग्रहण लग जाता है। लेकिन ग्रहणकाल की इसकी वेदना ही छाए हुए अंधकार को दूर करने के लिए संघर्ष हेतु और अविनाशी अवधारणा के देदीप्यमान प्रकाश को बिखेरने के लिए विशाल जनसमूह को प्रेरित करती है।
ऐसा लगता है कि राष्ट्र को उचित सीख लेने और इसके माध्यम से उस अवधारणा हेतु अपनी प्रतिबध्दता बहाल करने के लिए इतिहास जान-बूझकर ऐसी अग्नि-परीक्षा की स्थिति पैदा करता है।
ऐसा ही कुछ जून 1975 में भारत में हुआ, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारत पर कू्रर आपातकालीन शासन लागू कर लोकतंत्र पर ग्रहण लगा दिया। उन्नीस माह के बाद कांग्रेस पार्टी की तानाशाही के विरुध्द भारत की जनता के गौरवशाली संघर्ष के परिणामस्वरूप यह ग्रहण छँटा। यदि आपातकाल स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक अंधकारमय अवधि थी तो लोकतंत्र की बहाली के लिए किया गया विजयी संघर्ष सबसे देदीप्यमान घटना। ऐसा हुआ कि मैं अपने हजारों देशवासियों की तरह आपातकाल की संपूर्ण उन्नीस माह की अवधि जेल में व्यतीत करने के कारण इसका भुक्तभोगी तथा आपातकाल के विरुध्द युध्द में विजय प्राप्त करनेवाली लोकतंत्र सेना का एक सेनानी-दोनों रूपों में था।
जून 1975 की दो दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ:
भारत की स्वतंत्रता के साठ वर्षों पर नजर डालने पर पता चलता है कि इन छह दशकों में दो तिथियाँ ऐसी हैं, जिन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता है और ये दोनों जून 1975 से जुड़ी हुई हैं।
इनमें से एक है-12 जून। सभी राजनीतिक विश्लेषकों को अचंभे में डालते हुए गुजरात विधानसभा चुनावों में इंदिरा कांग्रेस की भारी पराजय हुई। दूसरा, उसी दिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रायबरेली से इंदिरा गांधी के लोकसभा में चुने जाने को निरस्त कर दिया और इसके साथ ही चुनावों में भ्रष्टाचार फैलाने के आधार पर उन्हें छह वर्षों के लिए चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित कर दिया।
दूसरी तिथि है-25 जून। लोकतंत्र-प्रेमियों के लिए यह तिथि स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे काले दिवसों में से एक के रूप में याद रखी जाएगी। इस दुर्भाग्यपूर्ण तिथि से घटनाओं की ऐसी शृंखला चल पड़ी, जिसने विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को विश्व की दूसरी सबसे बड़ी तानाशाही में परिवर्तित कर दिया।
दिल्ली में जून के महीने में सबसे अधिक गरमी होती है। अतएव जब दल-बदल के विरुध्द प्रस्तावित कानून से संबंधित संयुक्त संसदीय समिति ने बगीचों के शहर बंगलौर, जो कि ग्रीष्मकाल में भी अपनी शीतल-सुखद जलवायु के लिए विख्यात है, में 26-27 जून को अपनी बैठक करने का निर्णय लिया तो मुझे काफी प्रसन्नता हुई। हम दोनों-अटलजी और मैं-इस समिति के सदस्य थे, जिसके कांग्रेस (ओ) के नेता श्याम नंदन मिश्र भी सदस्य थे।
हालाँकि, जब 25 जून की सुबह मैं दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पर बंगलौर जानेवाले विमान पर सवार हुआ तो मुझे इस बात का जरा भी खयाल नहीं था कि यह यात्रा दो वर्ष लंबी अवधि के लिए मेरे 'निर्वासन' की शुरुआत है, जिसके संबंध में माउंट आबू बैठक के दौरान पार्टी सांसद और प्रख्यात ज्योतिषी डॉ. वसंत कुमार पंडित ने भविष्यवाणी की थी।
लोकसभा के अधिकारियों ने बंगलौर हवाई अड्डे पर मेरे सहयात्री मिश्र और मेरी अगवानी की। राज्य विधानसभा के विशाल भवन के पास स्थित विधायक निवास पर हमें ले जाया गया। अटलजी एक दिन पहले ही वहाँ पहुँच चुके थे। इस संयुक्त संसदीय समिति के अध्यक्ष थे-कांग्रेस पार्टी के दरबारा सिंह, जो बाद में पंजाब के मुख्यमंत्री बने।
26 जून को सुबह 7.30 बजे मेरे पास जनसंघ के स्थानीय कार्यालय से एक फोन आया। दिल्ली से जनसंघ के सचिव रामभाऊ गोडबोले का एक अत्यावश्यक संदेश था। वे कह रहे थे कि मध्य रात्रि के तुरंत बाद जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई और अन्य महत्त्वपूर्ण नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया है। गिरफ्तारी जारी है। पुलिस शीघ्र ही अटलजी और आपको गिरफ्तार करने के लिए पहुँचने वाली होगी। मैंने यह सूचना श्याम बाबू को दी। इसके बाद हम लोग एक साथ अटलजी के कमरे में गए। इस संबंध में संक्षिप्त चर्चा के बाद हम इस निर्णय पर पहुँचे कि हम लोग गिरफ्तारी से बचने का प्रयास नहीं करेंगे।
8.00 बजे आकाशवाणी से समाचार सुनने के लिए मैंने रेडियो चलाया। मुझे आकाशवाणी समाचारवाचक की परिचित आवाज के स्थान पर इंदिरा गांधी की गमगीन आवाज सुनाई दी। यह उनका राष्ट्र के नाम किया जानेवाला अचानक प्रसारण था, इस सूचना के साथ कि राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत आपातकाल घोषित कर दिया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आंतरिक अशांति से निबटने के लिए आपातकाल लागू करना आवश्यक था।
मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ, जब मैंने उन्हें यह कहते हुए सुना कि विपक्ष के बहुत बड़े षडयंत्र से देश को बचाने की आवश्यकता है। इसके साथ ही उनका मनगढ़ंत आरोप यह था कि कुछ ऐसे तत्त्व हैं, जो लोकतंत्र के नाम पर भारत के लोकतंत्र को मिटाने के लिए तत्पर थे और इसे रोकने की आवश्यकता थी।
अटलजी और मैंने एक संयुक्त प्रेस वक्तव्य तैयार किया, जिसमें जयप्रकाशजी* और अन्य नेताओं की गिरफ्तारी की भर्त्सना की गई, आपातकाल की निंदा की गई और घोषणा की गई कि 26 जून, 1975 का वही ऐतिहासिक महत्त्व होगा, जो स्वतंत्रता पूर्व अवधि में 9 अगस्त, 1942 का है, जब महात्मा गांधी ने ब्रिटिश शासकों से कहा था-'भारत छोड़ो।'
हालाँकि यह वक्तव्य एक व्यर्थ प्रयास था। लोगों तक इस संदेश को पहुँचाने का कोई माध्यम ही नहीं था, क्योंकि आपातकाल की घोषणा के साथ ही सरकार ने तानाशाही की चिरपरिचित परंपरा के अनुकूल प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दी। स्वतंत्रता के बाद पहली बार प्रेस पर पूर्ण सेंसरशिप** लगाई गई थी।
पुलिस हम लोगों को गिरफ्तार करने के लिए सुबह 10.00 बजे आ पहुँची। प्रख्यात समाजवादी नेता मधु दंडवते भी एक अन्य संसदीय समिति की बैठक में भाग लेने के लिए बंगलौर में मौजूद थे, उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। हम चारों को बंगलौर सेंट्रल जेल ले जाया गया। उस दिन, मेरी डायरी*** में उल्लिखित है-''26 जून, 1975 का दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का अंतिम दिन हो सकता है। आशा करता हूँ कि मेरा यह भय गलत सिध्द हो।'
-लालकृष्ण आडवाणी
(यह लेख वरिष्ठ भाजपा नेता एवं पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की आत्मकथा 'मेरा देश मेरा जीवन' से लिया गया है। प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक का लोकार्पण 25 जून को भोपाल में श्रीश्री रविशंकर करेंगे )
शुक्रवार, 18 जून 2010
जम्मू-कश्मीर सरकार का हिंदुओं पर जजिया कर
जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा 1 जुलाई 2010 से माता वैष्णों देवी दर्शनों के लिए अपनी गाड़ियों से जाने वाले श्रद्धालुओं की प्रत्येक कार पर 2000 रूपये व तीन दिन के बाद 2000 रूपये प्रतिदिन की दर से एंट्री फीस वसूल की जा रही है।
इसी प्रकार बाबा अमरनाथ यात्रा पर अपनी गाड़ी से जाने वाले श्रद्धालुओं से 2000 रूपये एंट्री फीस और सात दिन के बाद 2000 रूपये प्रतिदिन दर से एंट्री फीस वसूल की जा रही है।
श्रद्धालुओं एवं लंगर संस्थाओं से तुगलकी फरमान जारी करके जजिया कर वसूल किया जा रहा है। जजिया रूपी टैक्स को 300 से बढ़ाकर सीधा 2300 कर दिया गया है, जो कि आठ गुना है।
इसी तरह से माता वैष्णो देवी व अमरनाथ यात्रियों को लेकर आने वाले वाहन पर भी 24 सौ रुपये टैक्स लगा दिया गया है।
पिछले कई सालों से लंगर लगाने वाले स्थल को भी कम कर दिया गया है, वहीं लंगर कमेटियों को अपने ही देश में पहचान पत्र लाजिमी कर दिया गया है। हिंदुओं को जलील करने की इससे घटिया कार्यवाही और क्या होगी कि अपने ही देश के एक हिस्से में प्रवेश के लिए वीजा फीस वसूली जा रही है, जिसकी राशि 25,000 रुपये है। जो कि दुनिया के सभी देशों से ज्यादा है।
सरकार की दोगली वोट बैंक की राजनीति बेहद अफसोसजनक है। एक ओर जहां हज यात्रियों को सब्सिडी दी जा रही है। वहीं अपने ही देश में हिंदुओं से जजिया कर वसूला जा रहा है।
अमरनाथ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए देश के विभिन्न हिस्से से यहां आकर लोग लंगर लगाते हैं। इन्हें सहयोग करने के बजाए सरकार सिक्योरिटी मनी के नाम पर 25 हजार रुपये जमा करा रही है। यह राशि उन्हें वापस नहीं की जाएगी।
केन्द्र सरकार की कमजोर नीतियों की वजह से आज हिन्दुस्तान में देश विरोधी ताकतें सक्रिय हो रही हैं, जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण जम्मू कश्मीर सरकार द्वारा हिन्दुओं पर लगाया गया जजिया कर है।
सरकार द्वारा लगाए गए टैक्स यहां आने वाले श्रद्धालुओं के साथ ही करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं के साथ खिलवाड़ है। जिसे बर्दास्त नहीं किया जाना चाहिए।
जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा 1 जुलाई 2010 से माता वैष्णों देवी दर्शनों के लिए अपनी गाड़ियों से जाने वाले श्रद्धालुओं की प्रत्येक कार पर 2000 रूपये व तीन दिन के बाद 2000 रूपये प्रतिदिन की दर से एंट्री फीस वसूल की जा रही है।
इसी प्रकार बाबा अमरनाथ यात्रा पर अपनी गाड़ी से जाने वाले श्रद्धालुओं से 2000 रूपये एंट्री फीस और सात दिन के बाद 2000 रूपये प्रतिदिन दर से एंट्री फीस वसूल की जा रही है।
श्रद्धालुओं एवं लंगर संस्थाओं से तुगलकी फरमान जारी करके जजिया कर वसूल किया जा रहा है। जजिया रूपी टैक्स को 300 से बढ़ाकर सीधा 2300 कर दिया गया है, जो कि आठ गुना है।
इसी तरह से माता वैष्णो देवी व अमरनाथ यात्रियों को लेकर आने वाले वाहन पर भी 24 सौ रुपये टैक्स लगा दिया गया है।
पिछले कई सालों से लंगर लगाने वाले स्थल को भी कम कर दिया गया है, वहीं लंगर कमेटियों को अपने ही देश में पहचान पत्र लाजिमी कर दिया गया है। हिंदुओं को जलील करने की इससे घटिया कार्यवाही और क्या होगी कि अपने ही देश के एक हिस्से में प्रवेश के लिए वीजा फीस वसूली जा रही है, जिसकी राशि 25,000 रुपये है। जो कि दुनिया के सभी देशों से ज्यादा है।
सरकार की दोगली वोट बैंक की राजनीति बेहद अफसोसजनक है। एक ओर जहां हज यात्रियों को सब्सिडी दी जा रही है। वहीं अपने ही देश में हिंदुओं से जजिया कर वसूला जा रहा है।
अमरनाथ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए देश के विभिन्न हिस्से से यहां आकर लोग लंगर लगाते हैं। इन्हें सहयोग करने के बजाए सरकार सिक्योरिटी मनी के नाम पर 25 हजार रुपये जमा करा रही है। यह राशि उन्हें वापस नहीं की जाएगी।
केन्द्र सरकार की कमजोर नीतियों की वजह से आज हिन्दुस्तान में देश विरोधी ताकतें सक्रिय हो रही हैं, जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण जम्मू कश्मीर सरकार द्वारा हिन्दुओं पर लगाया गया जजिया कर है।
सरकार द्वारा लगाए गए टैक्स यहां आने वाले श्रद्धालुओं के साथ ही करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं के साथ खिलवाड़ है। जिसे बर्दास्त नहीं किया जाना चाहिए।
इसी प्रकार बाबा अमरनाथ यात्रा पर अपनी गाड़ी से जाने वाले श्रद्धालुओं से 2000 रूपये एंट्री फीस और सात दिन के बाद 2000 रूपये प्रतिदिन दर से एंट्री फीस वसूल की जा रही है।
श्रद्धालुओं एवं लंगर संस्थाओं से तुगलकी फरमान जारी करके जजिया कर वसूल किया जा रहा है। जजिया रूपी टैक्स को 300 से बढ़ाकर सीधा 2300 कर दिया गया है, जो कि आठ गुना है।
इसी तरह से माता वैष्णो देवी व अमरनाथ यात्रियों को लेकर आने वाले वाहन पर भी 24 सौ रुपये टैक्स लगा दिया गया है।
पिछले कई सालों से लंगर लगाने वाले स्थल को भी कम कर दिया गया है, वहीं लंगर कमेटियों को अपने ही देश में पहचान पत्र लाजिमी कर दिया गया है। हिंदुओं को जलील करने की इससे घटिया कार्यवाही और क्या होगी कि अपने ही देश के एक हिस्से में प्रवेश के लिए वीजा फीस वसूली जा रही है, जिसकी राशि 25,000 रुपये है। जो कि दुनिया के सभी देशों से ज्यादा है।
सरकार की दोगली वोट बैंक की राजनीति बेहद अफसोसजनक है। एक ओर जहां हज यात्रियों को सब्सिडी दी जा रही है। वहीं अपने ही देश में हिंदुओं से जजिया कर वसूला जा रहा है।
अमरनाथ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए देश के विभिन्न हिस्से से यहां आकर लोग लंगर लगाते हैं। इन्हें सहयोग करने के बजाए सरकार सिक्योरिटी मनी के नाम पर 25 हजार रुपये जमा करा रही है। यह राशि उन्हें वापस नहीं की जाएगी।
केन्द्र सरकार की कमजोर नीतियों की वजह से आज हिन्दुस्तान में देश विरोधी ताकतें सक्रिय हो रही हैं, जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण जम्मू कश्मीर सरकार द्वारा हिन्दुओं पर लगाया गया जजिया कर है।
सरकार द्वारा लगाए गए टैक्स यहां आने वाले श्रद्धालुओं के साथ ही करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं के साथ खिलवाड़ है। जिसे बर्दास्त नहीं किया जाना चाहिए।
जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा 1 जुलाई 2010 से माता वैष्णों देवी दर्शनों के लिए अपनी गाड़ियों से जाने वाले श्रद्धालुओं की प्रत्येक कार पर 2000 रूपये व तीन दिन के बाद 2000 रूपये प्रतिदिन की दर से एंट्री फीस वसूल की जा रही है।
इसी प्रकार बाबा अमरनाथ यात्रा पर अपनी गाड़ी से जाने वाले श्रद्धालुओं से 2000 रूपये एंट्री फीस और सात दिन के बाद 2000 रूपये प्रतिदिन दर से एंट्री फीस वसूल की जा रही है।
श्रद्धालुओं एवं लंगर संस्थाओं से तुगलकी फरमान जारी करके जजिया कर वसूल किया जा रहा है। जजिया रूपी टैक्स को 300 से बढ़ाकर सीधा 2300 कर दिया गया है, जो कि आठ गुना है।
इसी तरह से माता वैष्णो देवी व अमरनाथ यात्रियों को लेकर आने वाले वाहन पर भी 24 सौ रुपये टैक्स लगा दिया गया है।
पिछले कई सालों से लंगर लगाने वाले स्थल को भी कम कर दिया गया है, वहीं लंगर कमेटियों को अपने ही देश में पहचान पत्र लाजिमी कर दिया गया है। हिंदुओं को जलील करने की इससे घटिया कार्यवाही और क्या होगी कि अपने ही देश के एक हिस्से में प्रवेश के लिए वीजा फीस वसूली जा रही है, जिसकी राशि 25,000 रुपये है। जो कि दुनिया के सभी देशों से ज्यादा है।
सरकार की दोगली वोट बैंक की राजनीति बेहद अफसोसजनक है। एक ओर जहां हज यात्रियों को सब्सिडी दी जा रही है। वहीं अपने ही देश में हिंदुओं से जजिया कर वसूला जा रहा है।
अमरनाथ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए देश के विभिन्न हिस्से से यहां आकर लोग लंगर लगाते हैं। इन्हें सहयोग करने के बजाए सरकार सिक्योरिटी मनी के नाम पर 25 हजार रुपये जमा करा रही है। यह राशि उन्हें वापस नहीं की जाएगी।
केन्द्र सरकार की कमजोर नीतियों की वजह से आज हिन्दुस्तान में देश विरोधी ताकतें सक्रिय हो रही हैं, जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण जम्मू कश्मीर सरकार द्वारा हिन्दुओं पर लगाया गया जजिया कर है।
सरकार द्वारा लगाए गए टैक्स यहां आने वाले श्रद्धालुओं के साथ ही करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं के साथ खिलवाड़ है। जिसे बर्दास्त नहीं किया जाना चाहिए।
लेबल:
अमरनाथ,
जम्मू कश्मीर,
तुगलकी,
वैष्णों देवी,
हिन्दु,
हिन्दुस्तान,
hardayal
सदस्यता लें
संदेश (Atom)